चौथा अध्याय / बयान 5 / चंद्रकांता

कुंअर वीरेन्द्रसिंह तीनों ऐयारों के साथ खोह के अंदर घूमने लगे। तेजसिंह ने इधर – उधर के कई निशानों को देखकर कुमार से कहा, “बेशक यहां का छोटा तिलिस्म तोड़ कोई खजाना ले गया। जरूर कुमारी चंद्रकान्ता को भी उसी ने कैद किया होगा। मैंने अपने ओस्ताद की जुबानी सुना था कि इस खोह में कई इमारतें और बाग देखने बल्कि रहने लायक हैं। शायद वह चोर इन्हीं में कहीं मिल भी जाय तो ताज्जुब नहीं।”

कुमार – तब जहां तक हो सके काम में जल्दी करनी चाहिए।

तेज – बस हमारे साथ चलिये, अभी से काम शुरू हो जाय।

यह कह तेजसिंह कुंअर वीरेन्द्रसिंह को उस पहाड़ी के नीचे ले गये जहां से पानी का चश्मा शुरू होता था। उस चश्मे से उत्तार को चालीस हाथ नापकर कुछ जमीन खोदी।

कुमार से तेजसिंह ने कहा था कि ”इस छोटे तिलिस्म के तोड़ने और खजाना पाने की तरकीब किसी धाातु पत्र पर खुदी हुई यहीं जमीन में गड़ी है।”मगर इस वक्त यहां खोदने से उसका कुछ पता न लगा, हां एक खत उसमें से जरूर मिली जिसको कुमार ने निकालकर पढ़ा। यह लिखा था :

“अब क्या खोदते हो! मतलब की कोई चीज नहीं है, जो था सो निकल गया, तिलिस्म टूट गया। अब हाथ मल के पछताओ।”

तेज – (कुमार की तरफ देखकर) देखिये यह पूरा सबूत तिलिस्म टूटने का मिल गया!

कुमार – जब तिलिस्म टूट ही चुका है तो उसके हर एक दरवाजे भी खुले होंगे?

“हां जरूर खुले होंगे”, यह कहकर तेजसिंह पहाड़ियों पर चढ़ाते – घुमाते – फिराते कुमार को एक गुफा के पास ले गए जिसमें सिर्फ एक आदमी के जाने लायक राह थी।

तेजसिंह के कहने से एक – एक कर चारों आदमी उस गुफा में घुसे। भीतर कुछ दूर जाकर खुलासी जगह मिली, यहां तक कि चारों आदमी खड़े होकर चलने लगे, मगर टटोलते हुए क्योंकि बिल्कुल अंधेरा था, हाथ तक नहीं दिखाई देता था। चलते – चलते कुंअर वीरेन्द्रसिंह का हाथ एक बंद दरवाजे पर लगा जो धाक्का देने से खुल गया और भीतर बखूबी रोशनी मालूम होने लगी।

चारों आदमी अंदर गये, छोटा – सा बाग देखा जो चारों तरफ से साफ, कहीं तिनके का नाम – निशान नहीं, मालूम होता था अभी कोई झाड़ू देकर गया है। इस बाग में कोई इमारत न थी, सिर्फ एक फव्वारा बीच में था, मगर यह नहीं मालूम होता था कि इसका हौज कहां है।

बाग में घूमने और इधर – उधर देखने से मालूम हुआ कि ये लोग पहाड़ी के ऊपर चले गये हैं। जब फव्वारे के पास पहुंचे तो एक बात ताज्जुब की दिखाई पड़ी। उस जगह जमीन पर जनाने हाथ का एक जोड़ा कंगन नजर पड़ा, जिसे देखते ही कुमार ने पहचान लिया कि कुमारी चंद्रकान्ता के हाथ का है। झट उठा लिया, आंखों से आंसू की बूंदें टपकने लगीं, तेजसिंह से पूछा – ”यह कंगन यहां क्योंकर पहुंचा? इसके बारे में क्या ख्याल किया जाय?” तेजसिंह कुछ जवाब दिया ही चाहते थे कि उनकी निगाह एक कागज पर जा पड़ी जो उसी जगह खत की तरह मोड़ा पड़ा हुआ था। जल्दी से उठा लिया और खोलकर पढ़ा, यह लिखा था :

“बड़ी होशियारी से जाना, ऐयार लोग पीछा करेंगे, ऐसा न हो कि पता लग जाय, नहीं तो तुम्हारा और कुमार दोनों का ही बड़ा भारी नुकसान होगा। अगर मौका मिला तो कल आऊंगी – वही।”

इस पुर्जे को पढ़कर तेजसिंह किसी सोच में पड़ गये, देर तक चुपचाप खड़े न जाने क्या – क्या विचार करते रहे। आखिर कुमार से न रहा गया, पूछा, “क्यों क्या सोच रहे हो? इस खत में क्या लिखा है?”

तेजसिंह ने वह खत कुमार के हाथ में दे दी, वे भी पढ़कर हैरान हो गए, बोले, “इसमें जो कुछ लिखा है उस पर गौर करने से तो मालूम होता है कि हमारे और वनकन्या के मामले में ही कुछ है, मगर किसने लिखा यह पता नहीं लगता।”

तेज – आपका कहना ठीक है पर मैं एक और बात सोच रहा हूं जो इससे भी ताज्जुब की है।

कुमार – वह क्या?

तेज – इन हरफों को मैं कुछ – कुछ पहचानता हूं, मगर साफ समझ में नहीं आता क्योंकि लिखने वाले ने अपना हरफ छिपाने के लिए कुछ बिगाड़कर लिखा है।

कुमार – खैर इस खत को रख छोड़ो, कभी – न – कभी कुछ पता लग ही जायगा, अब आगे का काम करो।

फिर ये लोग घूमने लगे। बाग में कोने में इन लोगों को छोटी – छोटी चार खिड़कियां नजर आईं जो एक के साथ एक बराबर – सी बनी हुई थीं। पहले चारों आदमी बाईं तरफ वाली खिड़की में घुसे। थोड़ी दूर जाकर एक दरवाजा मिला जिसके आगे जाने की बिल्कुल राह न थी क्योंकि नीचे बेढब खतरनाक पहाड़ी दिखाई देती थी।

इधर – उधर देखने और खूब गौर करने से मालूम हुआ कि यह वही दरवाजा है जिसको इशारे से उस योगी ने तेजसिंह को दिखाया था। इस जगह से वह दलान बहुत साफ दिखाई देता था जिसमें कुमारी चंद्रकान्ता और चपला बहुत दिनों तक बेबस पड़ी थीं।

ये लोग वापस होकर फिर उसी बाग में चले आये और उसके बगल वाली दूसरी खिड़की में घुसे जो बहुत अंधेरी थी। कुछ दूर जाने पर उजाला नजर पड़ा बल्कि हद तक पहुंचने पर एक बड़ा – सा खुला फाटक मिला जिससे बाहर होकर ये चारों आदमी खड़े हो चारों ओर निगाह दौड़ाने लगे।

लंबे – चौड़े मैदान के सिवाय और कुछ न नजर आया। तेजसिंह ने चाहा कि घूमकर इस मैदान का हाल मालूम करें। मगर कई सबबों से वे ऐसा न कर सके। एक तो धूप बहुत कड़ी थी दूसरे कुमार ने घूमने की राय न दी और कहा, “फिर जब मौका होगा इसको देख लेंगे। इस वक्त तीसरी व चौथी खिड़की में चलकर देखना चाहिए कि क्या है।”

चारों आदमी लौट आये और तीसरी खिड़की में घुसे। एक बाग में पहुंचते ही देखा वनकन्या कई सखियों को लिए घूम रही है, लेकिन कुंअर वीरेन्द्रसिंह वगैरह को देखते ही तेजी के साथ बाग के कोने में जाकर गायब हो गई।

चारों आदमियो ने उसका पीछा किया और घूम – घूमकर तलाश भी किया मगर कहीं कुछ भी पता न लगा, हां जिस कोने में जाकर वे सब गायब हुई थीं वहां जाने पर एक बंद दरवाजा जरूर देखा जिसके खोलने की बहुत तरकीब की मगर न खुला।

उस बाग के एक तरफ छोटी – सी बारहदरी थी। लाचार होकर ऐयारों के साथ कुंअर वीरेन्द्रसिंह उस बारहदरी में एक ओर बैठकर सोचने लगे, “यह वनकन्या यहां कैसे आई? क्या उसके रहने का यही ठिकाना है? फिर हम लोगों को देखकर भाग क्यों गई? क्या अभी हमसे मिलना उसे मंजूर नहीं?” इन सब बातों को सोचते – सोचते शाम हो गई मगर किसी की अक्ल ने कुछ काम न किया।

इस बाग में मेवों के दरख्त बहुत थे। और एक छोटा – सा चश्मा भी था। चारों आदमियों ने मेवों से अपना पेट भरा और चश्मे का पानी पीकर उसी बारहदरी में जमीन पर ही लेट गये। यह राय ठहरी कि रात को इसी बारहदरी में गुजारा करेंगे, सबेरे जो कुछ होगा देखा जायगा।

देवीसिंह ने अपने बटुए में से सामान निकालकर चिराग जलाया, इसके बाद बैठकर आपस में बातें करने लगे।

कुमार – चंद्रकान्ता की मुहब्बत में हमारी दुर्गति हो गई, तिस पर भी अब तक कोई उम्मीद मालूम नहीं पड़ती।

तेज – कुमारी सही – सलामत हैं और आपको मिलेंगी इसमें कोई शक नहीं। जितनी मेहनत से जो चीज मिलती है उसके साथ उतनी ही खुशी में जिंदगी बीततीहै।

कुमार – तुमने चपला के लिए कौन – सी तकलीफ उठाई?

तेज – तो चपला ही ने मेरे लिए कौन – सा दुख भोगा? जो कुछ किया कुमारी चंद्रकान्ता के लिए।

ज्यो – क्यों तेजसिंह, क्या यह चपला तुम्हारी ही जाति की है?

तेज – इसका हाल तो कुछ मालूम नहीं कि यह कौन जात है, लेकिन जब मुहब्बत हो गई तो फिर चाहे कोई जात हो।

ज्यो – लेकिन क्या उसका कोई वली वारिस भी नहीं है? अगर तुम्हारी जाति की न हुई तो उसके मां – बाप कब कबूल करेंगे?

तेज – अगर कुछ ऐसा – वैसा हुआ तो उसको मार डालूंगा और अपनी भी जान दे दूंगा।

कुमार – कुछ इनाम दो तो हम चपला का हाल तुम्हें बता दें।

तेज – इनाम में हम चपला ही को आपके हवाले कर देंगे।

कुमार – खूब याद रखना, चपला फिर हमारी हो जायगी।

तेज – जी हां, जी हां, आपकी हो जायगी आपकी हो जायगी।

कुमार – चपला हमारी ही जाति की है। इसका बाप बड़ा भारी जमींदार और पूरा ऐयार था। इसको सात दिन का छोड़कर इसकी मां मर गयी। इसके बाप ने इसे पाला और ऐयारी सिखाई। अभी कुछ ही वर्ष गुजरे हैं कि इसका बाप भी मर गया। महाराज जयसिंह उसको बहुत मानते थे, उसने इनके बहुत बड़े -बड़े काम किये थे। मरने के वक्त अपनी बिल्कुल जमा – पूंजी और चपला को महाराज के सुपुर्द कर गया, क्योंकि उसका कोई वारिस नहीं था। महाराज जयसिंह इसको अपनी लड़की की तरह मानते हैं और महारानी भी इसे बहुत चाहती हैं। कुमारी चंद्रकान्ता का और इसका लड़कपन ही से साथ होने के सबब दोनों में बड़ी मुहब्बत है।

तेज – आज तो आपने बड़ी खुशी की बात सुनाई, बहुत दिनों से इसका खुटका लगा हुआ था पर कई बातों को सोचकर आपसे नहीं पूछा। भला यह बातें आपको मालूम कैसे हुईं?

कुमार – खास चंद्रकान्ता की जुबानी।

तेज – तब तो बहुत ठीक है।

तमाम रात बातचीत में गुजर गई, किसी को नींद न आई। सबेरे ही उठकर जरूरी कामों से छुट्टी पा उसी चश्मे में नहाकर संध्या – पूजा की और कुछ मेवा खा जिस राह से उस बाग में गये थे उसी राह से लौट आये और चौथी खिड़की के अंदर क्या है यह देखने के लिए उसमें घुसे। उसमें भी जाकर एक हरा – भरा बाग देखा जिसे देखते ही कुमार चौंक पड़े।

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