तीसरा अध्याय / बयान 17 / चंद्रकांता

फतहसिंह सेनापति की बहादुरी ने किले वालों के छक्के छुड़ा दिये। यही मालूम होता था कि अगर इसी तरह रात भर लड़ाई होती रही तो सबेरे तक किला हाथ से जाता रहेगा और फाटक टूट जायेगा। तरद्दुद में पड़े बद्रीनाथ वगैरह ऐयार इधर – उधर घबराये घूम रहे थे कि इतने में एक चोबदार ने आकर गुल & शोर मचाना शुरू किया जिससे बद्रीनाथ और भी घबरा गए। चोबदार बिल्कुल जख्मी हो रहा था ओैर उसके चेहरे पर इतने जख्म लगे हुए थे कि खून निकलने से उसको पहचानना मुश्किल हो रहा था।

बद्री – (घबराकर) यह क्या, तुमको किसने जख्मी किया?

चोबदार – आप लोग तो इधर के ख्याल में ऐसा भूले हैं कि और बातों की कोई सुधा ही नहीं। पिछवाड़े की तरफ से कुंअर वीरेन्द्रसिंह के कई आदमी घुस आए हैं और किले में चारों तरफ घूम – घूमकर न मालूम क्या कर रहे हैं। मैंने एक का मुकाबिला भी किया मगर वह बहुत ही चालाक और फुर्तीला था, मुझे इतना जख्मी किया कि दो घंटे तक बदहवास जमीन पर पड़ा रहा, मुश्किल से यहां तक खबर देने आया हूं। आती दफे रास्ते में उसे दीवारों पर कागज चिपकाते देखा मगर खौफ के मारे कुछ न बोला।

पन्ना – यह बुरी खबर सुनने में आई!

बद्री – वे लोग कै आदमी हैं, तुमने देखा है?

चोब – कई आदमी मालूम होते हैं मगर मुझे एक ही से वास्ता पड़ा था।

बद्री – तुम उसे पहचान सकते हो?

चोब – हां, जरूर पहचान लूंगा क्योंकि मैंने रोशनी में उसकी सूरत बखूबी देखीहै।

बद्री – मैं उन लोगों को ढूंढने चलता हूं, तुम साथ चल सकते हो?

चोब – क्यों न चलूंगा, मुझे उसने अधामरा कर डाला था, अब बिना गिरफ्तार कराये कब चैन पड़ना है!

बद्री – अच्छा चलो।

बद्रीनाथ, पन्नालाल, रामनारायण और चुन्नीलाल चारों आदमी अंदर की तरफ चले, साथ – साथ जख्मी चोबदार भी रवाना हुआ। जनाने महल के पास पहुंचकर देखा कि एक आदमी जमीन पर बदहवास पड़ा है, एक मशाल थोड़ी दूर पर पड़ी हुई है जो कुछ जल रही है, पास ही तेल की कुप्पी भी नजर पड़ी,मालूम हो गया कि कोई मशालची है। चोबदार ने चौंककर कहा, “देखो – देखो एक और आदमी उसने मारा!” यह कहकर मशाल और कुप्पी झट से उठा ली और उसी कुप्पी से मशाल में तेल छोड़ उसके चेहरे के पास ले गया। बद्रीनाथ ने देखकर पहचाना कि यह अपना ही मशालची है। नाक पर हाथ रख के देखा,समझ गये कि इसे बेहोशी की दवा दी गई है। चोबदार ने कहा, “आप इसे छोड़िये, चलकर पहले उस बदमाश को ढूंढिए, मैं यही मशाल लिए आपके साथ चलता हूं। कहीं ऐसा न हो कि वे लोग महाराज जयसिंह को छुड़ा ले जायं।”

बद्रीनाथ ने कहा, “पहले उसी जगह चलना चाहिए जहां महाराज जयसिंह कैद हैं।” सबों की राय यही हुई और सब उसी जगह पहुंचे। देखा तो महाराज जयसिंह कोठरी में हथकड़ी पहने लेटे हैं। चोबदार ने खूब गौर से उस कोठरी और दरवाजे को देखकर कहा, “नहीं, वे लोग यहां तक नहीं पहुंचे, चलिए दूसरी तरफ ढूंढें।” चारों तरफ ढूंढने लगे। घूमते – घूमते दीवारों और दरवाजों पर सटे हुए कई पुर्जे दिखे जिसे पढ़ते ही इन ऐयारों के होश जाते रहे। खड़े हो सोच ही रहे थे कि चोबदार चिल्ला उठा और एक कोठरी की तरफ इशारा करके बोला, “देखो – देखो, अभी एक आदमी उस कोठरी में घुसा है, जरूर वही है जिसने मुझे जख्मी किया था!” यह कह उस कोठरी की तरफ दौड़ा मगर दरवाजे पर रुक गया, तब तक ऐयार लोग भी पहुंच गये।

बद्री – (चोबदार से) चलो, अंदर चलो।

चोब – पहले तुम लोग हाथों में खंजर या तलवार ले लो, क्योंकि वह जरूर वार करेगा।

बद्री – हम लोग होशियार हैं, तुम अंदर चलो क्योंकि तुम्हारे हाथ में मशालहै।

चोब – नहीं बाबा, मैं अंदर नहीं जाऊंगा, एक दफे किसी तरह जान बची, अब कौन & सी कम्बख्ती सवार है कि जानबूझकर भाड़ में जाऊं।

बद्री – वाह रे डरपोक! इसी जीवट पर महाराजों के यहां नौकरी करता है? ला मेरे हाथ में मशाल दे, मत जा अंदर!

चोब – लो मशाल लो, मैं डरपोक सही, इतने जख्म खाये अभी डरपोक ही रह गया, अपने को लगती तो मालूम होता, इतनी मदद कर दी यही बहुत है!

इतना कह चोबदार मशाल और कुप्पी बद्रीनाथ के हाथ में देकर अलग हो गया। चारों ऐयार कोठरी के अंदर घुसे। थोड़ी दूर गये होंगे कि बाहर से चोबदार ने किवाड़ बंद करके जंजीर चढ़ा दी, तब अपनी कमर से पथरी निकाल आग झाड़कर बत्ती जलाई और चौखट के नीचे जो एक छोटी & सी बारूद की चुपड़ी हुई पलीती निकाली हुई थी उसमें आग लगा दी। वह बत्ती बलकर सुरसुराती हुई घुस गई।

पाठक समझ गये होंगे कि यह चोबदार साहब कौन थे। ये ऐयारों के सिरताज जीतसिंह थे। चोबदार बन ऐयारों को खौफ दिलाकर अपने साथ ले आये और घुमाते & फिराते वह जगह देख ली जहां महाराज जयसिंह कैद थे। फिर धोखा देकर इन ऐयारों को उस कोठरी में बंद कर दिया जिसे पहले ही से अपने ढंग का बना रखा था।

इस कोठरी के अंदर पहले ही से बेहोशी की बारूद[1] पाव भर के अंदाज कोनेमें रख दी थी और लंबी पलीती बारूद के साथ लगा कर चौखट के बाहर निकाल दीथी।

पलीती में आग लगा और दरवाजे को उसी तरह बंद छोड़ उस जगह गये जहां महाराज जयसिंह कैद थे। वहां बिल्कुल सन्नाटा था, दरवाजा खोल बेड़ी और हथकड़ी काटकर उन्हें बाहर निकाला और अपना नाम बताकर कहा, “जल्द यहां से चलिए।”

जिधर से जीतसिंह कमंद लगाकर किले में आये थे उसी राह से महाराज जयसिंह को नीचे उतारा और तब कहा, “आप नीचे ठहरिये, मैंने ऐयारों को भी बेहोश किया है, एक-एक करके कमंद में बांधाकर उन लोगों को लटकाता जाता हूं आप खोलते जाइये। अंत में मैं भी उतरकर आपके साथ लश्कर में चलूंगा।” महाराज जयसिंह ने खुश होकर इसे मंजूर किया।

जीतसिंह ने लौटकर उस कोठरी की जंजीर खोली जिसमें बद्रीनाथ वगैरह चारों ऐयारों को फंसाया था। अपने नाक में लखलखे से तर की हुई रूई डाल कोठरी के अंदर घुसे, तमाम धूएं से भरा हुआ पाया, बत्ती जला बद्रीनाथ वगैरह बेहोश ऐयारों को घसीटकर बाहर लाये और किले की पिछली दीवार की तरफ ले जाकर एक – एक करके सबों को नीचे उतार आप भी उतर आये। चारो ऐयारो को एक तरफ छिपा महाराज जयसिंह को लश्कर में पहुंचाया फिर कई कहारों को साथ ले उस जगह जा ऐयारों को उठवा लाए, हथकड़ी – बेड़ी डालकर खेमे में कैर कर पहरा मुकर्रर कर दिया।

महाराज जयसिंह और सुरेन्द्रसिंह गले मिले, जीतसिंह की बहुत कुछ तारीफ करके दोनों राजों ने कई इलाके उनको दिये, जिनकी सनद भी उसी वक्त मुहर करके उनके हवाले की गई।

रात बीत गई, पूरब की तरफ से धीरे – धीरे सफेदी निकलने लगी और लड़ाई बंद कर दी गई।

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