दहर में नक़्शे-वफ़ा / ग़ालिब

दहर[1] में नक़्श-ए-वफ़ा वजह-ए-तसल्ली न हुआ
है यह वो लफ़्ज़ कि शर्मिन्दा-ए-माअ़नी[2] न हुआ

सब्ज़ा-ए-ख़त[3] से तेरा काकुल-ए-सरकश[4] न दबा
यह ज़मुर्रद[5] भी हरीफ़े-दमे-अफ़ई[6] न हुआ

मैंने चाहा था कि अन्दोह[7]-ए-वफ़ा से छूटूं
वह सितमगर मेरे मरने पे भी राज़ी न हुआ

दिल गुज़रगाह[8]-ए-ख़याले-मै-ओ-साग़र[9] ही सही
गर नफ़स[10] जादा-ए-सर-मंज़िल-ए-तक़वी[11] न हुआ

हूँ तेरे वादा न करने में भी राज़ी कि कभी
गोश[12] मिन्नत-कशे[13]-गुलबांग-ए-तसल्ली[14] न हुआ

किससे महरूमी-ए-क़िस्मत[15] की शिकायत कीजे
हम ने चाहा था कि मर जाएं, सो वह भी न हुआ

मर गया सदमा-ए-यक-जुम्बिशे-लब[16] से ग़ालिब
ना-तवानी[17] से हरीफ़[18]-ए-दम-ए-ईसा[19] न हुआ

शब्दार्थ
1. ↑ संसार
2. ↑ सार्थक
3. ↑ गालों पर आती नई दाढ़ी
4. ↑ (यहाँ पुरुष की)ज़ुल्फ की लट
5. ↑ नीलम (पत्थर)
6. ↑ साँप की फुंकार के बराबर
7. ↑ दुःख
8. ↑ राही
9. ↑ शराब और प्याला की सोच
10. ↑ सांस
11. ↑ भक्ति की मंजिल का रास्ता
12. ↑ कान
13. ↑ आभारी
14. ↑ सांत्वना की मधुर ध्वनि
15. ↑ दुर्भाग्य
16. ↑ एक बार होंठ हिलने का सदमा
17. ↑ दुर्बलता
18. ↑ सामना करना
19. ↑ ईसा की साँस

श्रेणी: ग़ज़ल

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