दिल मेरा सोज़े-निहां से बेमहाबा जल गया / ग़ालिब

दिल मेरा सोज़े-निहां[1] से बेमहाबा[2] जल गया
आतिशे-ख़ामोश[3] के मानिन्द गोया जल गया

दिल में ज़ौक़े[4]-वस्लों[5]-यादे-यार तक बाक़ी नहीं
आग इस घर को लगी ऐसी कि जो था जल गया

मैं अ़दम[6] से भी परे हूँ वर्ना ग़ाफ़िल[7] बारहा[8]
मेरी आहे-आतशीं[9] से बोले-अ़न्क़ा[10] जल गया

अर्ज़ कीजे जौहर-ए-अन्देशा[11] की गर्मी कहाँ
कुछ ख़याल आया था वहशत का कि सेहरा जल गया

दिल नहीं, तुझ को दिखाता वरना दाग़ों की बहार
इस चिराग़ां का करूँ क्या, कारफ़र्मा[12] जल गया

मैं हूँ और अफ़सुर्दगी[13] की आरज़ू “ग़ालिब” के दिल
देखकर तर्ज़े-तपाके[14]-अहल[15]-ए-दुनिया जल गया

शब्दार्थ
1. ↑ आंतरिक जलन
2. ↑ एकदम
3. ↑ मूक आग
4. ↑ चाह
5. ↑ मिलन
6. ↑ अस्तित्वहीनता
7. ↑ बे-परवाह
8. ↑ कई बार
9. ↑ जलती हुई आह
10. ↑ अ़नक़ा नामक पक्षी का पंख
11. ↑ चिंता की प्रकृति
12. ↑ कार्यकर्ता
13. ↑ उदासी
14. ↑ व्यवहार का ढंग
15. ↑ लोग

श्रेणी: ग़ज़ल

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