मरदूद-ए-ख़लाइक़ हूँ गुनहगार हूँ मैं साहिर देहल्वी

मरदूद-ए-ख़लाइक़ हूँ गुनहगार हूँ मैं

पामाल-ए-जहाँ हूँ कि सज़ा-वार हूँ मैं

अंजाम जो ख़ाक है अगर जीते-जी

मिल जाऊँ न ख़ाक में तो बेकार हूँ मैं

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