शौक़ हर रंग रक़ीबे-सरो-सामां निकला / ग़ालिब

शौक़, हर रंग, रक़ीब-ए-सर-ओ-सामाँ[1] निकला
क़ैस[2], तस्वीर के पर्दे में भी, उरियाँ[3] निकला

ज़ख़्म ने दाद न दी तंगी-ए-दिल की, यारब
तीर भी सीना-ए-बिस्मिल[4] से पर-अफ़शाँ[5] निकला

बू-ए-गुल, नाला-ए-दिल[6], दूद[7]-ए-चिराग़े-महफ़िल
जो तेरी बज़्म से निकला, सो परीशाँ निकला

दिले-हसरत-ज़दा[8] था माइदा-ए-लज़्ज़ते-दर्द[9]
काम यारों का ब-क़द्रे-लब-ओ-दनदाँ[10] निकला

थी नौ-आमोज़[11]-फ़ना हिम्मते दुश्वार-पसंद
सख़्त मुश्किल है कि ये काम भी आसाँ निकला

दिल में, फिर गिरिया[12] ने इक शोर उठाया, “ग़ालिब”
आह! जो क़तरा न निकला था, सो तूफ़ाँ निकला

शब्दार्थ
1. ↑ सामान का दुश्मन
2. ↑ मजनूं
3. ↑ नग्न
4. ↑ घायल की छाती
5. ↑ पंख फड़फड़ाता हुआ
6. ↑ दिल की आह
7. ↑ धुआँ
8. ↑ इच्छुक
9. ↑ दर्द के मज़े का दावती-मेज़
10. ↑ हर किसी की काबलियत के अनुसार
11. ↑ नौसिखिया
12. ↑ रोने-धोने

श्रेणी: ग़ज़ल

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