सरापा रहने-इशक़ो / ग़ालिब

सरापा[1] रहने-इश्क़[2]-ओ[3]-नागुज़ीरे-उल्फ़ते-हस्ती[4]
इबादत बरक़[5] की करता हूं और अफ़सोस हासिल[6] का

बक़दरे-ज़रफ़[7] है साक़ी ख़ुमारे-तश्नाकामी[8] भी
जो तू दरिया-ए-मै[9] है, तो मैं ख़मियाज़ा[10] हूं साहिल का

शब्दार्थ
1. ↑ सिर से पांव तक
2. ↑ प्रेम पर अर्पित
3. ↑ और
4. ↑ जीवन-प्रेम के सामने असहाय
5. ↑ बिजली
6. ↑ फसल
7. ↑ सामर्थ्य के अनुसार
8. ↑ प्यास का नशा
9. ↑ शराब की नदी
10. ↑ अंगड़ाई, अंत

श्रेणी: ग़ज़ल

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