इड़ा / भाग २ / कामायनी / जयशंकर प्रसाद

वह प्रेम न रह जाये पुनीत

अपने स्वार्थों से आवृत

हो मंगल-रहस्य सकुचे सभीत

सारी संसृति हो विरह भरी,


गाते ही बीतें करुण गीत

आकांक्षा-जलनिधि की सीमा हो

क्षितिज निराशा सदा रक्त

तुम राग-विराग करो सबसे


अपने को कर शतशः विभक्त

मस्तिष्क हृदय के हो विरुद्ध,

दोनों में हो सद्भाव नहीं

वह चलने को जब कहे कहीं


तब हृदय विकल चल जाय कहीं

रोकर बीते सब वर्त्तमान

क्षण सुंदर अपना हो अतीत

पेंगों में झूलें हार-जीत।


संकुचित असीम अमोघ शक्ति

जीवन को बाधा-मय पथ पर

ले चले मेद से भरी भक्ति

या कभी अपूर्ण अहंता में हो


रागमयी-सी महासक्ति

व्यापकता नियति-प्रेरणा बन

अपनी सीमा में रहे बंद

सर्वज्ञ-ज्ञान का क्षुद्र-अशं


विद्या बनकर कुछ रचे छंद

करत्तृत्व-सकल बनकर आवे

नश्वर-छाया-सी ललित-कला

नित्यता विभाजित हो पल-पल में


काल निरंतर चले ढला

तुम समझ न सको, बुराई से

शुभ-इच्छा की है बड़ी शक्ति

हो विफल तर्क से भरी युक्ति।


जीवन सारा बन जाये युद्ध

उस रक्त, अग्नि की वर्षा में

बह जायँ सभी जो भाव शुद्ध

अपनी शंकाओं से व्याकुल तुम


अपने ही होकर विरूद्ध

अपने को आवृत किये रहो

दिखलाओ निज कृत्रिम स्वरूप

वसुधा के समतल पर उन्नत


चलता फिरता हो दंभ-स्तूप

श्रद्धा इस संसृति की रहस्य-

व्यापक, विशुद्ध, विश्वासमयी

सब कुछ देकर नव-निधि अपनी


तुमसे ही तो वह छली गयी

हो वर्त्तमान से वंचित तुम

अपने भविष्य में रहो रुद्ध

सारा प्रपंच ही हो अशुद्ध।


तुम जरा मरण में चिर अशांत

जिसको अब तक समझे थे

सब जीवन परिवर्त्तन अनंत

अमरत्व, वही भूलेगा तुम


व्याकुल उसको कहो अंत

दुखमय चिर चिंतन के प्रतीक

श्रद्धा-वमचक बनकर अधीर

मानव-संतति ग्रह-रश्मि-रज्जु से


भाग्य बाँध पीटे लकीर

‘कल्याण भूमि यह लोक’

यही श्रद्धा-रहस्य जाने न प्रजा।

अतिचारी मिथ्या मान इसे


परलोक-वंचना से भरा जा

आशाओं में अपने निराश

निज बुद्धि विभव से रहे भ्रांत

वह चलता रहे सदैव श्रांत।”


अभिशाप-प्रतिध्वनि हुई लीन

नभ-सागर के अंतस्तल में

जैसे छिप जाता महा मीन

मृदु-मरूत्-लहर में फेनोपम


तारागण झिलमिल हुए दीन

निस्तब्ध मौन था अखिल लोक

तंद्रालस था वह विजन प्रांत

रजनी-तम-पूंजीभूत-सदृश


मनु श्वास ले रहे थे अशांत

वे सोच रहे थे” आज वही

मेरा अदृष्ट बन फिर आया

जिसने डाली थी जीवन पर


पहले अपनी काली छाया

लिख दिया आज उसने भविष्य

यातना चलेगी अंतहीन

अब तो अवशिष्ट उपाय भी न।”


करती सरस्वती मधुर नाद

बहती थी श्यामल घाटी में

निर्लिप्त भाव सी अप्रमाद

सब उपल उपेक्षित पड़े रहे


जैसे वे निष्ठुर जड़ विषाद

वह थी प्रसन्नता की धारा

जिसमें था केवल मधुर गान

थी कर्म-निरंतरता-प्रतीक


चलता था स्ववश अनंत-ज्ञान

हिम-शीतल लहरों का रह-रह

कूलों से टकराते जाना

आलोक अरुण किरणों का उन पर


अपनी छाया बिखराना-

अदभुत था निज-निर्मित-पथ का

वह पथिक चल रहा निर्विवाद

कहता जाता कुछ सुसंवाद।


प्राची में फैला मधुर राग

जिसके मंडल में एक कमल

खिल उठा सुनहला भर पराग

जिसके परिमल से व्याकुल हो


श्यामल कलरव सब उठे जाग

आलोक-रश्मि से बुने उषा-

अंचल में आंदोलन अमंद

करता प्रभात का मधुर पवन


सब ओर वितरने को मरंद

उस रम्य फलक पर नवल चित्र सी

प्रकट हुई सुंदर बाला

वह नयन-महोत्सव की प्रतीक


अम्लान-नलिन की नव-माला

सुषमा का मंडल सुस्मित-सा

बिखरता संसृति पर सुराग

सोया जीवन का तम विराग।


वह विश्व मुकुट सा उज्जवलतम

शशिखंड सदृश था स्पष्ट भाल

दो पद्म-पलाश चषक-से दृग

देते अनुराग विराग ढाल


गुंजरित मधुप से मुकुल सदृश

वह आनन जिसमें भरा गान

वक्षस्थल पर एकत्र धरे

संसृति के सब विज्ञान ज्ञान


था एक हाथ में कर्म-कलश

वसुधा-जीवन-रस-सार लिये

दूसरा विचारों के नभ को था

मधुर अभय अवलंब दिये


त्रिवली थी त्रिगुण-तरंगमयी,

आलोक-वसन लिपटा अराल

चरणों में थी गति भरी ताल।

नीरव थी प्राणों की पुकार


मूर्छित जीवन-सर निस्तरंग

नीहार घिर रहा था अपार

निस्तब्ध अलस बन कर सोयी

चलती न रही चंचल बयार


पीता मन मुकुलित कंज आप

अपनी मधु बूँदे मधुर मौन

निस्वन दिगंत में रहे रुद्ध

सहसा बोले मनु ” अरे कौन-


आलोकमयी स्मिति-चेतना

आयी यह हेमवती छाया’

तंद्रा के स्वप्न तिरोहित थे

बिखरी केवल उजली माया


वह स्पर्श-दुलार-पुलक से भर

बीते युग को उठता पुकार

वीचियाँ नाचतीं बार-बार।

प्रतिभा प्रसन्न-मुख सहज खोल


वह बोली-” मैं हूँ इड़ा, कहो

तुम कौन यहाँ पर रहे डोल”

नासिका नुकीली के पतले पुट

फरक रहे कर स्मित अमोल


” मनु मेरा नाम सुनो बाले

मैं विश्व पथिक स रहा क्लेश।”

” स्वागत पर देख रहे हो तुम

यह उजड़ा सारस्वत प्रदेश


भौति हलचल से यह

चंचल हो उठा देश ही था मेरा

इसमें अब तक हूँ पड़ी

इस आशा से आये दिन मेरा।”


” मैं तो आया हूँ- देवि बता दो

जीवन का क्या सहज मोल

भव के भविष्य का द्वार खोल

इस विश्वकुहर में इंद्रजाल


जिसने रच कर फैलाया है

ग्रह, तारा, विद्युत, नखत-माल

सागर की भीषणतम तरंग-सा

खेल रहा वह महाकाल


तब क्या इस वसुधा के

लघु-लघु प्राणी को करने को सभीत

उस निष्ठुर की रचना कठोर

केवल विनाश की रही जीत


तब मूर्ख आज तक क्यों समझे हैं

सृष्टि उसे जो नाशमयी

उसका अधिपति होगा कोई,

जिस तक दुख की न पुकार गयी


सुख नीड़ों को घेरे रहता

अविरत विषाद का चक्रवाल

किसने यह पट है दिया डाल

शनि का सुदूर वह नील लोक


जिसकी छाया-फैला है

ऊपर नीचे यह गगन-शोक

उसके भी परे सुना जाता

कोई प्रकाश का महा ओक


वह एक किरण अपनी देकर

मेरी स्वतंत्रता में सहाय

क्या बन सकता है? नियति-जाल से

मुक्ति-दान का कर उपाय।”


कोई भी हो वह क्या बोले,

पागल बन नर निर्भर न करे

अपनी दुर्बलता बल सम्हाल

गंतव्य मार्ग पर पैर धरे-


मत कर पसार-निज पैरों चल,

चलने की जिसको रहे झोंक

उसको कब कोई सके रोक?

हाँ तुम ही हो अपने सहाय?


जो बुद्धि कहे उसको न मान कर

फिर किसकी नर शरण जाय

जितने विचार संस्कार रहे

उनका न दूसरा है उपाय


यह प्रकृति, परम रमणीय

अखिल-ऐश्वर्य-भरी शोधक विहीन

तुम उसका पटल खोलने में परिकर

कस कर बन कर्मलीन


सबका नियमन शासन करते

बस बढ़ा चलो अपनी क्षमता

तुम ही इसके निर्णायक हो,

हो कहीं विषमता या समता


तुम जड़ा को चैतन्या करो

विज्ञान सहज साधन उपाय

यश अखिल लोक में रहे छाय।”

हँस पड़ा गगन वह शून्य लोक


जिसके भीतर बस कर उजड़े

कितने ही जीवन मरण शोक

कितने हृदयों के मधुर मिलन

क्रंदन करते बन विरह-कोक


ले लिया भार अपने सिर पर

मनु ने यह अपना विषम आज

हँस पड़ी उषा प्राची-नभ में

देखे नर अपना राज-काज


चल पड़ी देखने वह कौतुक

चंचल मलयाचल की बाला

लख लाली प्रकृति कपोलों में

गिरता तारा दल मतवाला


उन्निद्र कमल-कानन में

होती थी मधुपों की नोक-झोंक

वसुधा विस्मृत थी सकल-शोक।

“जीवन निशीथ का अधंकार


भग रहा क्षितिज के अंचल में

मुख आवृत कर तुमको निहार

तुम इड़े उषा-सी आज यहाँ

आयी हो बन कितनी उदार


कलरव कर जाग पड़े

मेरे ये मनोभाव सोये विहंग

हँसती प्रसन्नता चाव भरी

बन कर किरनों की सी तरंग


अवलंब छोड़ कर औरों का

जब बुद्धिवाद को अपनाया

मैं बढा सहज, तो स्वयं

बुद्धि को मानो आज यहाँ पाया


मेरे विकल्प संकल्प बनें,

जीवन ही कर्मों की पुकार

सुख साधन का हो खुला द्वार।”

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